दुनिया भर में मौसम का मिजाज बदलने के बीच वैज्ञानिकों की नजर प्रशांत महासागर की परिस्थितियों पर टिकी हुई है। इस समय मजबूत हो रहा अल नीनो (El Niño) वैश्विक तापमान और बारिश के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। आने वाले महीनों में जब यह कमजोर पड़ेगा, तो मौसम की परिस्थितियों के सामान्य होने या ला नीना (La Niña) विकसित होने की संभावना पर भी नजर रखी जाएगी।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की 8 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा अल नीनो के दिसंबर 2026 के आसपास अपने चरम पर पहुंचने और फरवरी 2027 तक बने रहने की प्रबल संभावना है। वहीं, अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA के पूर्वानुमान में भी इसके मजबूत बने रहने के संकेत हैं। हालांकि, इसके बाद ला नीना आएगा या मौसम सामान्य स्थिति में लौटेगा, यह अभी निश्चित नहीं है।
क्या है अल नीनो और ला नीना?
अल नीनो और ला नीना प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में होने वाले बदलावों से जुड़े प्राकृतिक जलवायु पैटर्न हैं। इन दोनों के बीच की सामान्य अवस्था को ENSO-Neutral कहा जाता है।
अल नीनो के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसके साथ हवाओं और वायुमंडलीय परिसंचरण में भी बदलाव आते हैं, जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और तापमान को प्रभावित कर सकते हैं।
इसके विपरीत, ला नीना के दौरान इसी क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। व्यापारिक हवाएं अपेक्षाकृत मजबूत हो सकती हैं और समुद्र तथा वातावरण के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान बदल जाता है।
इन घटनाओं का प्रभाव केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता। इनके कारण कई क्षेत्रों में बारिश, सूखे, गर्मी और तूफानों की संभावनाओं में बदलाव हो सकता है। हालांकि, किसी क्षेत्र में मौसम कैसा रहेगा, यह दूसरे जलवायु कारकों और स्थानीय परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।
2026 में अल नीनो क्यों चर्चा में है?
अक्टूबर 2026 में जारी WMO की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। संगठन ने अनुमान लगाया कि अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान Niño 3.4 क्षेत्र में समुद्री तापमान की मौसमी विसंगति लगभग 3.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकती है।
यह एक पूर्वानुमान है, वास्तविक रूप से दर्ज हो चुका अंतिम आंकड़ा नहीं। इसके बावजूद, यह मौजूदा अल नीनो की संभावित तीव्रता को दर्शाता है।
NOAA की 8 अक्टूबर की रिपोर्ट में भी कहा गया कि अल नीनो मजबूत हो रहा है और जनवरी से मार्च 2027 तक इसके मजबूत या बहुत मजबूत बने रहने की संभावना 83 प्रतिशत से अधिक है।
इसका अर्थ यह है कि आने वाले महीनों में वैश्विक मौसम पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण रह सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया के हर हिस्से में एक जैसा मौसम रहेगा या हर क्षेत्र में गर्मी और सूखे की स्थिति जरूर बनेगी।
अल नीनो कमजोर होने के बाद क्या ला नीना आएगा?
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। अल नीनो के कमजोर होने के बाद तीन संभावनाएं हो सकती हैं।
पहली, प्रशांत महासागर की परिस्थितियां धीरे-धीरे सामान्य अवस्था यानी ENSO-Neutral में लौट सकती हैं।
दूसरी, समुद्र की सतह का तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियां बदलते हुए ला नीना की स्थिति विकसित कर सकती हैं।
तीसरी, संक्रमण की प्रक्रिया अपेक्षा से अधिक समय ले सकती है, जिसके कारण मौसम का पैटर्न कुछ समय तक बदलता रह सकता है।
अभी उपलब्ध पूर्वानुमानों के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि अल नीनो के बाद ला नीना ही आएगा। वैज्ञानिक समुद्र की सतह के तापमान, हवाओं, वायुमंडलीय दबाव और महासागर के भीतर मौजूद तापमान की लगातार निगरानी करते हैं। इन्हीं संकेतों के आधार पर भविष्य की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है।
इसलिए संभावित ला नीना को एक संभावना के रूप में देखना चाहिए, न कि पहले से तय मौसम परिवर्तन के रूप में।
भारत के मानसून पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत में अल नीनो और ला नीना की चर्चा अक्सर मानसून के संदर्भ में होती है। ऐतिहासिक रूप से अल नीनो की परिस्थितियां भारत में कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून की संभावना बढ़ा सकती हैं, जबकि ला नीना के दौरान कई बार मानसून सामान्य से बेहतर रहा है।
हालांकि, यह संबंध हर साल एक जैसा नहीं होता। हिंद महासागर का तापमान, इंडियन ओशन डाइपोल (IOD), वायुमंडलीय परिस्थितियां और अन्य मौसमी कारक भी भारत में बारिश को प्रभावित करते हैं।
WMO की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट में अक्टूबर से दिसंबर के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से में सामान्य से कम बारिश की संभावना का संकेत दिया गया है। यह मौसमी पूर्वानुमान है और इसे भारत के आगामी दक्षिण-पश्चिम मानसून का सीधा पूर्वानुमान नहीं समझना चाहिए।
भारत में अगले मानसून पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका आकलन करने के लिए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आधिकारिक पूर्वानुमान और बाद में जारी होने वाले अपडेट देखना जरूरी होगा।
दुनिया के तापमान और बारिश में क्या बदलाव हो सकते हैं?
मजबूत अल नीनो वैश्विक तापमान और बारिश के वितरण को प्रभावित कर सकता है। कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक गर्मी पड़ने की संभावना बढ़ सकती है, जबकि दूसरे इलाकों में बारिश का पैटर्न बदल सकता है।
WMO के अनुसार, मौजूदा अल नीनो के दौरान कुछ क्षेत्रों में सूखे का जोखिम बढ़ सकता है, जबकि अन्य क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश और बाढ़ की आशंका बन सकती है। इसका असर खेती, जल संसाधनों, पारिस्थितिकी और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।
फिर भी, अल नीनो किसी विशेष तूफान, बाढ़ या सूखे का अकेला कारण नहीं होता। किसी घटना की वास्तविक तीव्रता और स्थान पर स्थानीय मौसम प्रणालियों तथा अन्य परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है।
इसी वजह से वैज्ञानिक केवल अल नीनो या ला नीना के नाम के आधार पर किसी शहर या देश के मौसम का निश्चित अनुमान नहीं लगाते। वे कई स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों और मौसमी मॉडलों का विश्लेषण करते हैं।
अल नीनो और ला नीना की निगरानी क्यों जरूरी है?
अल नीनो और ला नीना के बदलावों की जानकारी किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों, सरकारों और आपदा प्रबंधन विभागों के लिए महत्वपूर्ण होती है। मौसमी पूर्वानुमान के आधार पर सिंचाई, जल भंडारण, फसल योजना और संभावित मौसम जोखिमों की तैयारी में मदद मिल सकती है।
आम लोगों के लिए भी जरूरी है कि वे सोशल मीडिया पर प्रसारित अपुष्ट दावों के बजाय मौसम विभागों की आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें।
फिलहाल उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी यही संकेत देती है कि अक्टूबर 2026 में अल नीनो मजबूत हो रहा है और 2027 की शुरुआत तक इसका प्रभाव बना रह सकता है। इसके बाद ला नीना विकसित होगा या प्रशांत महासागर की परिस्थितियां सामान्य होंगी, इस पर आगे के पूर्वानुमानों से ही अधिक स्पष्टता मिलेगी।
इसलिए दुनिया के मौसम में संभावित बड़े बदलावों पर नजर रखना जरूरी है, लेकिन किसी निश्चित नतीजे पर पहुंचने से पहले वैज्ञानिक प्रमाण और ताजा मौसम अपडेट देखना चाहिए।
